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कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है
کچھ تو کہہ وصل کی پھر رات چلی جاتی ہے
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बारिश में अहद तोड़ के गर मय-कशी हुई
بارش میں عہد توڑ کے گر مے کشی ہوئی
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रहा गर कोई ता क़यामत सलामत
رہا گر کوئی تا قیامت سلامت
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हवाएँ लाख चलें लौ सँभलती रहती है
ہوائیں لاکھ چلیں لو سنبھلتی رہتی ہے
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हर दम तरफ़ है वैसे मिज़ाज-ए-करख़्त का
ہر دم طرف ہے ویسے مزاج کرخت کا
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