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गर्दिश

सभी 6अशआर 0ग़ज़ल 6
ग़ज़ल6
कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है
کچھ تو کہہ وصل کی پھر رات چلی جاتی ہے
बारिश में अहद तोड़ के गर मय-कशी हुई
بارش میں عہد توڑ کے گر مے کشی ہوئی
रहा गर कोई ता क़यामत सलामत
رہا گر کوئی تا قیامت سلامت
हवाएँ लाख चलें लौ सँभलती रहती है
ہوائیں لاکھ چلیں لو سنبھلتی رہتی ہے
हर दम तरफ़ है वैसे मिज़ाज-ए-करख़्त का
ہر دم طرف ہے ویسے مزاج کرخت کا
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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