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कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है
मीर तक़ी मीर द्वारा
کچھ تو کہہ وصل کی پھر رات چلی جاتی ہے
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बारिश में अहद तोड़ के गर मय-कशी हुई
قمر جلالوی द्वारा
بارش میں عہد توڑ کے گر مے کشی ہوئی
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रहा गर कोई ता क़यामत सलामत
मिर्ज़ा ग़ालिब द्वारा
رہا گر کوئی تا قیامت سلامت
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हवाएँ लाख चलें लौ सँभलती रहती है
Amjad Islam Amjad द्वारा
ہوائیں لاکھ چلیں لو سنبھلتی رہتی ہے
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हर दम तरफ़ है वैसे मिज़ाज-ए-करख़्त का
मीर तक़ी मीर द्वारा
ہر دم طرف ہے ویسے مزاج کرخت کا
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हर आशना में कहाँ ख़ू-ए-महरमाना वो
अहमद फ़राज़ द्वारा
ہر آشنا میں کہاں خوئے محرمانہ وہ
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