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ग़म

सभी 204अशआर 0ग़ज़ल 204
ग़ज़ल204
बिसात-ए-अज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा-ए-ख़ूँ वो भी
بساط عجز میں تھا ایک دل یک قطرہ خوں وہ بھی
टूटी है मेरी नींद मगर तुम को इस से क्या
ٹوٹی ہے میری نیند مگر تم کو اس سے کیا
इल्ज़ाम था दिये पे न तक़्सीर रात की
الزام تھا دیے پہ نہ تقصیر رات کی
सितम से गो यह तिरे कुश्ता-ए-वफ़ा न रहा
ستم سے گو یہ ترے کشتۂ وفا نہ رہا
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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