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बिसात-ए-अज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा-ए-ख़ूँ वो भी
بساط عجز میں تھا ایک دل یک قطرہ خوں وہ بھی
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टूटी है मेरी नींद मगर तुम को इस से क्या
ٹوٹی ہے میری نیند مگر تم کو اس سے کیا
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इल्ज़ाम था दिये पे न तक़्सीर रात की
الزام تھا دیے پہ نہ تقصیر رات کی
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सितम से गो यह तिरे कुश्ता-ए-वफ़ा न रहा
ستم سے گو یہ ترے کشتۂ وفا نہ رہا
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