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ग़म

सभी 204अशआर 0ग़ज़ल 204
ग़ज़ल204
जोशिश-ए-अश्क से हूँ आठ पहर पानी में
جوشش اشک سے ہوں آٹھ پہر پانی میں
किस हुस्न से कहूँ मैं उस की ख़ुश अख़्तरी की
کس حسن سے کہوں میں اس کی خوش اختری کی
हाल दिल 'मीर' का रो रो के सब ऐ माह सुना
حال دل میرؔ کا رو رو کے سب اے ماہ سنا
ग़ैर ने हम को ज़बह किया ने ताक़त है ने यारा है
غیر نے ہم کو ذبح کیا نے طاقت ہے نے یارا ہے
ख़ूबी का उस की बसके तलबगार हो गया
خوبی کا اس کی بسکہ طلب گار ہو گیا
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