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हिज्र

सभी 112अशआर 0ग़ज़ल 112
ग़ज़ल112
दोनों हैं उन के हिज्र का हासिल लिये हुए
دونوں ہیں ان کے ہجر کا حاصل لئے ہوئے
सैर कर अंदलीब का अहवाल
سیر کر عندلیب کا احوال
फिर मिरे शहर से गुज़रा है वो बादल की तरह
پھر مرے شہر سے گزرا ہے وہ بادل کی طرح
हिज्राँ की कोफ़्त खेंचे बे-दम से हो चले हैं
ہجراں کی کوفت کھینچے بے دم سے ہو چلے ہیں
उस ने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया
اس نے سکوت شب میں بھی اپنا پیام رکھ دیا
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