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अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ
अहमद फ़राज़ द्वारा
اب کے تجدید وفا کا نہیں امکاں جاناں
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इश्क़ हमारे ख़याल पड़ा है
मीर तक़ी मीर द्वारा
عشق ہمارے خیال پڑا ہے
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हटी ज़ुल्फ़ उनके चेहरे से मगर आहिस्ता आहिस्ता
قمر جلالوی द्वारा
ہٹی زلف ان کے چہرے سے مگر آہستہ آہستہ
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तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ
अहमद फ़राज़ द्वारा
تیرے قریب آ کے بڑی الجھنوں میں ہوں
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हर तमाशाई फ़क़त साहिल से मंज़र देखता
अहमद फ़राज़ द्वारा
ہر تماشائی فقط ساحل سے منظر دیکھتا
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तीर जो उस कमान से निकला
मीर तक़ी मीर द्वारा
تیر جو اس کمان سے نکلا
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मुस्तौजिब-ए-ज़ुल्म-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ
मीर तक़ी मीर द्वारा
مستوجب ظلم و ستم و جور و جفا ہوں
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खुद को तरें मयार से घट कर नहीं देखा
अहमद फ़राज़ द्वारा
خود کو ترے معیار سے گھٹ کر نہیں دیکھا
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