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सभी 74अशआर 0ग़ज़ल 74
ग़ज़ल74
मेरी लौ लगी है तुझसे ग़म-ए-ज़िंदगी मिटा दे
مری لو لگی ہے تجھ سے غم زندگی مٹا دے
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
نہیں نگاہ میں منزل تو جستجو ہی سہی
चांद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का
چاند نکلے کسی جانب تری زیبائی کا
शर्ह-ए-बेदर्दी-ए-हालात न होने पाई
شرح بے دردئ حالات نہ ہونے پائی
दिल में अब यूं तेरे भूले हुए ग़म आते हैं
دل میں اب یوں ترے بھولے ہوئے غم آتے ہیں
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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