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इश्क़

सभी 228अशआर 0ग़ज़ल 228
ग़ज़ल228
तड़पना भी देखा न बिस्मिल का अपने
تڑپنا بھی دیکھا نہ بسمل کا اپنے
तेरी अबरू ओ तेग़-ए-तेज़ तो हम-दम हैं ये दोनों
تری ابرو و تیغ تیز تو ہم دم ہیں یہ دونوں
जिन्स-ए-गिराँ को तुझ से जो लोग चाहते हैं
جنس گراں کو تجھ سے جو لوگ چاہتے ہیں
बज़्म से जब निगार उठता है
بزم سے جب نگار اٹھتا ہے
नाम ही क्या निशाँ ही क्या ख़्वाब-ओ-ख़याल हो गए
نام ہی کیا نشاں ہی کیا خواب و خیال ہو گئے
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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