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इश्क़

सभी 228अशआर 0ग़ज़ल 228
ग़ज़ल228
अधर आ कर शिकार-अफ़गन हमारा
ادھر آ کر شکار افگن ہمارا
मैं भी दुनिया में हूँ इक नाला-ए-परेशाँ यक जा
میں بھی دنیا میں ہوں اک نالہ پریشاں یک جا
दिल कितना आबाद हुआ जब दीद के घर बर्बाद हुए
دل کتنا آباد ہوا جب دید کے گھر برباد ہوئے
मेरे दाग़-ए-दिल वो चराग़ हैं नहीं निस्बतें जिन्हें शाम से
مرے داغ دل وہ چراغ ہیں نہیں نسبتیں جنہیں شام سے
तेरा ग़म रहे सलामत यही मेरी ज़िंदगी है
ترا غم رہے سلامت یہی میری زندگی ہے
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