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सभी 228अशआर 0ग़ज़ल 228
ग़ज़ल228
गिरां-ए-शब-ए-हिज्रां दो चंद क्या करते
گرانئ شب ہجراں دو چند کیا کرتے
क़र्ज़-ए-निगाह-ए-यार अदा कर चुके हैं हम
قرض نگاہ یار ادا کر چکے ہیں ہم
गरमी-ए-शौक़-ए-नज़ारा का असर तू देखो
گرمئ شوق نظارہ کا اثر تو دیکھو
हुज़ूर-ए-यार में हर्फ़-ए-इल्तिजा के रक्खे थे
حضور یار میں حرف التجا کے رکھے تھے
छाती जला करे है सोज़-ए-दरूँ बला है
چھاتی جلا کرے ہے سوز دروں بلا ہے
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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