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इश्क़

सभी 228अशआर 0ग़ज़ल 228
ग़ज़ल228
ये आलम-ए-शौक़ का देखा न जाए
یہ عالم شوق کا دیکھا نہ جائے
सुरख़ियां क्यों ढूंढ कर लाऊं फ़साने के लिए
سرخیاں کیوں ڈھونڈھ کر لاؤں فسانے کے لئے
कब तक तू इम्तिहाँ में मुझ से जुदा रहेगा
کب تک تو امتحاں میں مجھ سے جدا رہے گا
जहाँ अब ख़ार-ज़ारें हो गई हैं
جہاں اب خار زاریں ہو گئی ہیں
क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़
کیا حقیقت کہوں کہ کیا ہے عشق
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