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ये आलम-ए-शौक़ का देखा न जाए
یہ عالم شوق کا دیکھا نہ جائے
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सुरख़ियां क्यों ढूंढ कर लाऊं फ़साने के लिए
سرخیاں کیوں ڈھونڈھ کر لاؤں فسانے کے لئے
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कब तक तू इम्तिहाँ में मुझ से जुदा रहेगा
کب تک تو امتحاں میں مجھ سے جدا رہے گا
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जहाँ अब ख़ार-ज़ारें हो गई हैं
جہاں اب خار زاریں ہو گئی ہیں
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क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़
کیا حقیقت کہوں کہ کیا ہے عشق
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