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नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
نہیں نگاہ میں منزل تو جستجو ہی سہی
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जब नाम तिरा लीजिये तब चश्म भर आवे
جب نام ترا لیجیے تب چشم بھر آوے
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हसरत-ए-दीद में गुज़रां हैं ज़माने कब से
حسرتِ دید میں گزراں ہیں زمانے کب سے
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जब रोने बैठता हूँ तब क्या कसर रहे है
جب رونے بیٹھتا ہوں تب کیا کسر رہے ہے
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तेरा रुख़ मुख़तत क़ुरआन है हमारा
تیرا رخ مخطط قرآن ہے ہمارا
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