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सभी 51अशआर 0ग़ज़ल 51
ग़ज़ल51
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
نہیں نگاہ میں منزل تو جستجو ہی سہی
जब नाम तिरा लीजिये तब चश्म भर आवे
جب نام ترا لیجیے تب چشم بھر آوے
हसरत-ए-दीद में गुज़रां हैं ज़माने कब से
حسرتِ دید میں گزراں ہیں زمانے کب سے
जब रोने बैठता हूँ तब क्या कसर रहे है
جب رونے بیٹھتا ہوں تب کیا کسر رہے ہے
तेरा रुख़ मुख़तत क़ुरआन है हमारा
تیرا رخ مخطط قرآن ہے ہمارا
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