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नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
فیض احمد فیض द्वारा
نہیں نگاہ میں منزل تو جستجو ہی سہی
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जब नाम तिरा लीजिये तब चश्म भर आवे
मीर तक़ी मीर द्वारा
جب نام ترا لیجیے تب چشم بھر آوے
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हसरत-ए-दीद में गुज़रां हैं ज़माने कब से
فیض احمد فیض द्वारा
حسرتِ دید میں گزراں ہیں زمانے کب سے
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जब रोने बैठता हूँ तब क्या कसर रहे है
मीर तक़ी मीर द्वारा
جب رونے بیٹھتا ہوں تب کیا کسر رہے ہے
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तेरा रुख़ मुख़तत क़ुरआन है हमारा
मीर तक़ी मीर द्वारा
تیرا رخ مخطط قرآن ہے ہمارا
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जिस सर को ग़ुरूर आज है यां ताजवरी का
मीर तक़ी मीर द्वारा
جس سر کو غرور آج ہے یاں تاجوری کا
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हुस्न मरहून जोश-ए-बादः-ए-नाज़
فیض احمد فیض द्वारा
حسن مرہون جوش بادۂ ناز
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दिल बहम पहुँचा बदन में तब से सारा तन जला
मीर तक़ी मीर द्वारा
دل بہم پہنچا بدن میں تب سے سارا تن جلا
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यह तमन्ना है कि इस तरह मुसलमान होता
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
یہ تمنا ہے کہ اس طرح مسلماں ہوتا
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अब वही हर्फ़-ए-जुनूं सब की ज़बां ठहरी है
فیض احمد فیض द्वारा
اب وہی حرف جنوں سب کی زباں ٹھہری ہے
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अजब जुनूं-ए-मुसाफ़त में घर से निकला था
अहमद फ़राज़ द्वारा
عجب جنون مسافت میں گھر سے نکلا تھا
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आए हैं मीर काफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में
मीर तक़ी मीर द्वारा
آئے ہیں میرؔ کافر ہو کر خدا کے گھر میں
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दुनिया के हर ख़याल से बेगाना कर दिया
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
دنیا کے ہر خیال سے بیگانہ کر دیا
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बात बस से निकल चली है
فیض احمد فیض द्वारा
بات بس سے نکل چلی ہے
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आँखों में नमी आई चेहरे पे मलाल आया
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
آنکھوں میں نمی آئی چہرے پہ ملال آیا
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छूटता ही नहीं हो जिसे आज़ार-ए-मोहब्बत
मीर तक़ी मीर द्वारा
چھٹتا ہی نہیں ہو جسے آزار محبت
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गिरां-ए-शब-ए-हिज्रां दो चंद क्या करते
فیض احمد فیض द्वारा
گرانئ شب ہجراں دو چند کیا کرتے
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इश्क़ क्या क्या आफ़तें लाता रहा
मीर तक़ी मीर द्वारा
عشق کیا کیا آفتیں لاتا رہا
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सह्ल यूं राह-ए-ज़िंदगी की है
فیض احمد فیض द्वारा
سہل یوں راہ زندگی کی ہے
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मक़ाम-ए-होश से गुज़रा मकाँ से ला-मकाँ पहुँचा
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
مقام ہوش سے گزرا مکاں سے لا مکاں پہنچا
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