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किस हर्फ़ पे तू ने गोश-ए-लब ऐ जान-ए-जहाँ ग़म्माज़ किया
کس حرف پہ تو نے گوشۂ لب اے جان جہاں غماز کیا
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सब क़त्ल हो के तेरे मुक़ाबिल से आए हैं
سب قتل ہو کے تیرے مقابل سے آئے ہیں
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सितम की रस्में बहुत थीं लेकिन न थी तिरी अंजुमन से पहले
ستم کی رسمیں بہت تھیں لیکن نہ تھی تری انجمن سے پہلے
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जहाँ अब ख़ार-ज़ारें हो गई हैं
جہاں اب خار زاریں ہو گئی ہیں
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शब शम्अ पर पतंग के आने को इश्क़ है
شب شمع پر پتنگ کے آنے کو عشق ہے
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