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सभी 51अशआर 0ग़ज़ल 51
ग़ज़ल51
किस हर्फ़ पे तू ने गोश-ए-लब ऐ जान-ए-जहाँ ग़म्माज़ किया
کس حرف پہ تو نے گوشۂ لب اے جان جہاں غماز کیا
सब क़त्ल हो के तेरे मुक़ाबिल से आए हैं
سب قتل ہو کے تیرے مقابل سے آئے ہیں
सितम की रस्में बहुत थीं लेकिन न थी तिरी अंजुमन से पहले
ستم کی رسمیں بہت تھیں لیکن نہ تھی تری انجمن سے پہلے
जहाँ अब ख़ार-ज़ारें हो गई हैं
جہاں اب خار زاریں ہو گئی ہیں
शब शम्अ पर पतंग के आने को इश्क़ है
شب شمع پر پتنگ کے آنے کو عشق ہے
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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