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ऐश उम्मीद ही से ख़तरा है
عیش امید ہی سے خطرہ ہے
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ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे
ایسے چپ ہیں کہ یہ منزل بھی کڑی ہو جیسے
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गुफ़्तगू जब महाल की होगी
گفتگو جب محال کی ہوگی
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दिल जो है आग लगा दूँ उस को
دل جو ہے آگ لگا دوں اس کو
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ईज़ा-दही की दाद जो पाता रहा हूँ मैं
ایذا دہی کی داد جو پاتا رہا ہوں میں
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