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कशमकश

सभी 83अशआर 0ग़ज़ल 83
ग़ज़ल83
ऐश उम्मीद ही से ख़तरा है
عیش امید ہی سے خطرہ ہے
ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे
ایسے چپ ہیں کہ یہ منزل بھی کڑی ہو جیسے
गुफ़्तगू जब महाल की होगी
گفتگو جب محال کی ہوگی
दिल जो है आग लगा दूँ उस को
دل جو ہے آگ لگا دوں اس کو
ईज़ा-दही की दाद जो पाता रहा हूँ मैं
ایذا دہی کی داد جو پاتا رہا ہوں میں
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