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कशमकश

सभी 83अशआर 0ग़ज़ल 83
ग़ज़ल83
सितम सिखलाएगा रस्म-ए-वफ़ा ऐसे नहीं होता
ستم سکھلائے گا رسم وفا ایسے نہیں ہوتا
कभी जो आँख पे गेसू-ए-यार होता है
کبھی جو آنکھ پہ گیسوئے یار ہوتا ہے
जिस्म शोला है जभी जामा-ए-सादा पहना
جسم شعلہ ہے جبھی جامۂ سادہ پہنا
पस्पा हुई सिपाह तो परचम भी हम ही थे
پسپا ہوئی سپاہ تو پرچم بھی ہم ہی تھے
अपने होने की तब-ओ-ताब से बाहर न हुए
اپنے ہونے کی تب و تاب سے باہر نہ ہوئے
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