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तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
تمہاری یاد کے جب زخم بھرنے لگتے ہیں
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गिरां-ए-शब-ए-हिज्रां दो चंद क्या करते
گرانئ شب ہجراں دو چند کیا کرتے
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हुस्न कब इश्क़ का मम्नूने-वफ़ा होता है
حسن کب عشق کا ممنون وفا ہوتا ہے
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ख़ामोश हो क्यों दाद-ए-जफ़ा क्यों नहीं देते
خاموش ہو کیوں داد جفا کیوں نہیں دیتے
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आज मल्बूस में है कैसी थकन की ख़ुशबू
آج ملبوس میں ہے کیسی تھکن کی خوشبو
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