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तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
فیض احمد فیض द्वारा
تمہاری یاد کے جب زخم بھرنے لگتے ہیں
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गिरां-ए-शब-ए-हिज्रां दो चंद क्या करते
فیض احمد فیض द्वारा
گرانئ شب ہجراں دو چند کیا کرتے
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हुस्न कब इश्क़ का मम्नूने-वफ़ा होता है
قمر جلالوی द्वारा
حسن کب عشق کا ممنون وفا ہوتا ہے
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ख़ामोश हो क्यों दाद-ए-जफ़ा क्यों नहीं देते
अहमद फ़राज़ द्वारा
خاموش ہو کیوں داد جفا کیوں نہیں دیتے
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आज मल्बूस में है कैसी थकन की ख़ुशबू
परवीन शाकिर द्वारा
آج ملبوس میں ہے کیسی تھکن کی خوشبو
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क्या बुलबुल असीर है बे बाल-ओ-पर कि हम
मीर तक़ी मीर द्वारा
کیا بلبل اسیر ہے بے بال و پر کہ ہم
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गर्म हैं शोर से तुझ हुस्न के बाज़ार कई
मीर तक़ी मीर द्वारा
گرم ہیں شور سے تجھ حسن کے بازار کئی
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ऐ गुल नौ दमीदा के मानिंद
मीर तक़ी मीर द्वारा
اے گل نو دمیدہ کے مانند
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क़ैद में गुज़रेगी जो उम्र बड़े काम की थी
परवीन शाकिर द्वारा
قید میں گزرے گی جو عمر بڑے کام کی تھی
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तौबा कीजे अब फ़रेब-ए-दोस्ती खाएंगे क्या
قمر جلالوی द्वारा
توبہ کیجے اب فریب دوستی کھائیں گے کیا
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बहुत रोया वो हम को याद कर के
परवीन शाकिर द्वारा
بہت رویا وہ ہم کو یاد کر کے
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