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रुसवाई

सभी 24अशआर 0ग़ज़ल 24
ग़ज़ल24
चांद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का
چاند نکلے کسی جانب تری زیبائی کا
ताना ज़न था हर कोई हम पर दिल-ए-नादाँ समेत
طعنہ زن تھا ہر کوئی ہم پر دل ناداں سمیت
ऐ दोस्त कोई मुझ सा रुस्वा न हुआ होगा
اے دوست کوئی مجھ سا رسوا نہ ہوا ہوگا
चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया
چلنے کا حوصلہ نہیں رکنا محال کر دیا
कब मेरा नशीमन अहल-ए-चमन गुलशन में गवारा करते हैं
کب میرا نشیمن اہل چمن گلشن میں گوارا کرتے ہیں
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