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शराब

सभी 14अशआर 0ग़ज़ल 14
ग़ज़ल14
उम्र भर हम रहे शराबी से
عمر بھر ہم رہے شرابی سے
लब तेरे लअल-ए-नाब हैं दोनों
لب ترے لعل ناب ہیں دونوں
आम हुक्म-ए-शराब करता हूँ
عام حکم شراب کرتا ہوں
देखते हैं रक़्स में दिन रात पैमाने को हम
دیکھتے ہیں رقص میں دن رات پیمانے کو ہم
न सह सका जब मुसाफ़तों के अज़ाब सारे
نہ سہہ سکا جب مسافتوں کے عذاب سارے
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