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नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
نہیں نگاہ میں منزل تو جستجو ہی سہی
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वो तफ़ावुतें हैं मरे ख़ुदा कि ये तो नहीं कोई और है
وہ تفاوتیں ہیں مرے خدا کہ یہ تو نہیں کوئی اور ہے
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आप की याद आती रही रात भर
آپ کی یاد آتی رہی رات بھر
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वह अहद-ए-ग़म की काहिश-हाए-बे-हासिल को क्या समझें
وہ عہد غم کی کاہش ہائے بے حاصل کو کیا سمجھے
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रफ़ाक़तों में पशेमानियाँ तो होती हैं
رفاقتوں میں پشیمانیاں تو ہوتی ہیں
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