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था मुस्तआर हुस्न से उस के जो नूर था
تھا مستعار حسن سے اس کے جو نور تھا
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है वजह कोई ख़ास मेरी आँख जो नम है
ہے وجہ کوئی خاص مری آنکھ جو نم ہے
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हम आप ही को अपना मक़सूद जानते हैं
ہم آپ ہی کو اپنا مقصود جانتے ہیں
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आए हैं मीर काफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में
آئے ہیں میرؔ کافر ہو کر خدا کے گھر میں
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कमाल-ए-हुस्न है हुस्न-ए-कमाल से बाहर
کمال حسن ہے حسن کمال سے باہر
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