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ज़माना

सभी 9अशआर 0ग़ज़ल 9
ग़ज़ल9
अपनी ही आवाज़ को बे-शक़ कान में रखना
اپنی ہی آواز کو بے شک کان میں رکھنا
कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को
کبھی کہا نہ کسی سے ترے فسانے کو
हम ने जाना था सुख़न होंगे ज़बाँ पर कितने
ہم نے جانا تھا سخن ہوں گے زباں پر کتنے
रही न पुख़्तगी आलम में दौर-ए-ख़ामी है
رہی نہ پختگی عالم میں دور خامی ہے
फ़क़ीह-ए-शहर की मजलिस से कुछ भला न हुआ
فقیہ شہر کی مجلس سے کچھ بھلا نہ ہوا
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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