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अपनी ही आवाज़ को बे-शक़ कान में रखना
اپنی ہی آواز کو بے شک کان میں رکھنا
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कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को
کبھی کہا نہ کسی سے ترے فسانے کو
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हम ने जाना था सुख़न होंगे ज़बाँ पर कितने
ہم نے جانا تھا سخن ہوں گے زباں پر کتنے
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रही न पुख़्तगी आलम में दौर-ए-ख़ामी है
رہی نہ پختگی عالم میں دور خامی ہے
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फ़क़ीह-ए-शहर की मजलिस से कुछ भला न हुआ
فقیہ شہر کی مجلس سے کچھ بھلا نہ ہوا
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