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عشق اک میرؔ بھاری پتھر ہے کب یہ تجھ ناتواں سے اٹھتا ہے

इश्क़ इक मीर भारी पत्थर है कब यह तुझ ना-तवाँ से उठता है

— मीर तक़ी मीर
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دیکھ تو دل کہ جاں سے اٹھتا ہے یہ دھواں سا کہاں سے اٹھتا ہے

देख तो दिल के जाँ से उठता है यह धुआँ सा कहाँ से उठता है

— मीर तक़ी मीर
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یوں اٹھے آہ اس گلی سے ہم جیسے کوئی جہاں سے اٹھتا ہے

यूँ उठे आह इस गली से हम जैसे कोई जहाँ से उठता है

— मीर तक़ी मीर
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ہستی اپنی حباب کی سی ہےیہ نمائش سراب کی سی ہے

हस्ती अपनी हबाब की सी हैयह नुमाइश सराब की सी है

— मीर तक़ी मीर
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نازکی اس کے لب کی کیا کہیے پنکھڑی اک گلاب کی سی ہے

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए पंखड़ी एक गुलाब की सी है

— मीर तक़ी मीर
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میرؔ ان نیم باز آنکھوں میںساری مستی شراب کی سی ہے

मीर उन नीम-बाज़ आँखों मेंसारी मस्ती शराब की सी है

— मीर तक़ी मीर
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الٹی ہو گئیں سب تدبیریں کچھ نہ دوا نے کام کیادیکھا اس بیماری دل نے آخر کام تمام کیا

उलटी हो गईं सब तदबीरें कुछ दवा ने काम कियादेखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

— मीर तक़ी मीर
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ناحق ہم مجبوروں پر یہ تہمت ہے مختاری کیچاہتے ہیں سو آپ کریں ہیں ہم کو عبث بدنام کیا

नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी कीचाहते हैं सो आप करें हैं हम को अबस बदनाम किया

— मीर तक़ी मीर
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یاں کے سپید و سیہ میں ہم کو دخل جو ہے سو اتنا ہےرات کو رو رو صبح کیا یا دن کو جوں توں شام کیا

याँ के सुफ़ैद-ओ-सियह में हम को दख़ल जो है सो इतना हैरात को رو रो सुबह किया या दिन को जूँ तूँ शाम किया

— मीर तक़ी मीर
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