Himmat-e-Iltija Nahin Baaqi
ہمت التجا نہیں باقی
हिम्मत-ए-इल्तिजा नहीं बाक़ी
ग़ज़ल
१ मिनट पढ़ने मेंاک تری دید چھن گئی مجھ سے
ورنہ دنیا میں کیا نہیں باقی
Ek teri deed chhin gayi mujhse
Warna dunya mein kya nahin baaqi
اپنی مشق ستم سے ہاتھ نہ کھینچ
میں نہیں یا وفا نہیں باقی
Apni mashq-e-sitam se haath na khench
Main nahin ya wafa nahin baaqi
अपनी मश्क़-ए-सितम से हाथ न खींच
मैं नहीं या वफ़ा नहीं बाक़ी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ उर्दू के वो अहद-साज़ शायर हैं जिन्होंने इश्क़ की नफ़ासत को इन्क़िलाबी सोच से जोड़कर दुनिया भर में शौहरत हासिल की और अपने विचारों के लिए जेल भी गए।
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