Hukm-e-Sayyad Hai Ta Khatm-e-Tamashaye-Bahaar
حکم صیاد ہے تا ختم تماشائے بہار
हुक्म-ए-सैय्याद है ता ख़त्म-ए-तमाशाए-बहार
ग़ज़ल
१ मिनट पढ़ने मेंحکم صیاد ہے تا ختم تماشائے بہار
ساری دنیا کہے بلبل نہ کہے ہائے بہار
Hukm-e-sayyad hai ta khatm-e-tamashaye-bahaar
Saari duniya kahe bulbul na kahe haaye bahaar
हुक्म-ए-सैय्याद है ता ख़त्म-ए-तमाशाए-बहार
सारी दुनिया कहे बुलबुल न कहे हाय बहार
صبح گلگشت کو جاتے ہو کہ شرمائے بہار
کیا یہ مطلب ہے گلستاں سے نکل جائے بہار
Subh-e-gulgasht ko jaate ho ke sharmaye bahaar
Kya ye matlab hai gulistan se nikal jaaye bahaar
सुब्ह-ए-गुलगश्त को जाते हो कि शरमाए बहार
क्या ये मतलब है गुलिस्तां से निकल जाए बहार
منہ سے کچھ بھی دم رخصت نہ کہا بلبل نے
صرف صیاد نے اتنا تو سنا ہائے بہار
Munh se kuch bhi dam-e-rukhsat na kaha bulbul ne
Sirf sayyad ne itna to suna haaye bahaar
मुँह से कुछ भी दम-ए-रुख़्सत न कहा बुलबुल ने
सिर्फ़ सैय्याद ने इतना तो सुना हाय बहार

उस्ताद क़मर जलालवी क्लासिकी ग़ज़ल के वो अज़ीम शायर हैं, जिन्होंने एक साइकिल मैकेनिक के तौर पर मिले 'उस्ताद' के लक़ब (उपाधि) को अपनी बेहतरीन शायरी से एक अदबी पहचान में बदल दिया।
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