Na Tera Qurb Na Baada Hai Kya Kya Jaaye
نہ تیرا قرب نہ بادہ ہے کیا کیا جائے
न तेरा क़ुर्ब न बादा है क्या क्या जाए
ग़ज़ल
१ मिनट पढ़ने मेंنہ تیرا قرب نہ بادہ ہے کیا کیا جائے
پھر آج دکھ بھی زیادہ ہے کیا کیا جائے
Na tera qurb na baada hai kya kya jaaye
Phir aaj dukh bhi zyaada hai kya kya jaaye
न तेरा क़ुर्ब न बादा है क्या क्या जाए
फिर आज दुख भी ज़्यादा है क्या क्या जाए
ہمیں بھی عرض تمنا کا ڈھب نہیں آتا
مزاج یار بھی سادہ ہے کیا کیا جائے
Hamein bhi arz-e-tamanna ka dhab nahin aata
Mizaaj-e-yaar bhi saada hai kya kya jaaye
हमें भी अर्ज़-ए-तमन्ना का ढब नहीं आता
मिज़ाज-ए-यार भी सादा है क्या क्या जाए
کچھ اپنے دوست بھی ترکش بدوش پھرتے ہیں
کچھ اپنا دل بھی کشادہ ہے کیا کیا جائے
Kuchh apne dost bhi tarkash-ba-dosh phirte hain
Kuchh apna dil bhi kushaada hai kya kya jaaye
कुछ अपने दोस्त भी तरकश-ब-दोश फिरते हैं
कुछ अपना दिल भी कुशादा है क्या क्या जाए
وہ مہرباں ہے مگر دل کی حرص بھی کم ہو
طلب کرم سے زیادہ ہے کیا کیا جائے
Wo meharbaan hai magar dil ki hirs bhi kam ho
Talab karam se zyaada hai kya kya jaaye
वो मेहरबाँ है मगर दिल की हिर्स भी कम हो
तलब करम से ज़्यादा है क्या क्या जाए

अहमद फ़राज़ जदीद उर्दू ग़ज़ल के सबसे मक़बूल रूमानी शायर हैं, जिन्होंने अपनी शायरी में क्लासिकी रिवायत और जदीद खयालात को मिलाया, और तानाशाही के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की।
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