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कहते हैं बहार आई गुल फूल निकलते हैं
मीर तक़ी मीर द्वारा
کہتے ہیں بہار آئی گل پھول نکلتے ہیں
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तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ साथ
परवीन शाकिर द्वारा
تیرا گھر اور میرا جنگل بھیگتا ہے ساتھ ساتھ
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डसने लगे हैं ख़्वाब मगर किस से बोलिए
परवीन शाकिर द्वारा
ڈسنے لگے ہیں خواب مگر کس سے بولئے
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दामान-ए-कोह में जो मैं ढाढ़ मार रोया
मीर तक़ी मीर द्वारा
دامان کوہ میں جو میں ڈاڑھ مار رویا
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मुश्किल है होना रोकश रुख़्सार की झलक के
मीर तक़ी मीर द्वारा
مشکل ہے ہونا روکش رخسار کی جھلک کے
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अब तरी याद के जुगनू चमके
अहमद फ़राज़ द्वारा
اب تری یاد کے جگنو چمکے
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चमन में सुबह ये कहती थी हो कर चश्म-ए-तर शबनम
ख़्वाजा मीर दर्द द्वारा
چمن میں صبح یہ کہتی تھی ہو کر چشم تر شبنم
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जग में कोई न टुक हँसा होगा
ख़्वाजा मीर दर्द द्वारा
جگ میں کوئی نہ ٹک ہنسا ہوگا
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अब के भी सैर-ए-बाग़ की जी में हवस रही
मीर तक़ी मीर द्वारा
اب کے بھی سیر باغ کی جی میں ہوس رہی
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न किसी से पास मेरे यार का आना गया
मीर तक़ी मीर द्वारा
نا کسی سے پاس میرے یار کا آنا گیا
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ऐ अब्र-ए-तर तू और किसी सिम्त को बरस
मीर तक़ी मीर द्वारा
اے ابر تر تو اور کسی سمت کو برس
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मेरा ख़ामोश रह कर भी उन्हें सब कुछ सुना देना
قمر جلالوی द्वारा
مرا خاموش رہ کر بھی انہیں سب کچھ سنا دینا
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उसी में ख़ुश हूँ मिरा दुख कोई तो सहता है
परवीन शाकिर द्वारा
اسی میں خوش ہوں مرا دکھ کوئی تو سہتا ہے
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कोई हुआ न रोकश टुक मेरी चश्म-ए-तर से
मीर तक़ी मीर द्वारा
کوئی ہوا نہ روکش ٹک میری چشم تر سے
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यक्सू कुशादा रूई पर चीं नहीं जबीं भी
मीर तक़ी मीर द्वारा
یکسو کشادہ روئی پر چیں نہیں جبیں بھی
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