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मैं फ़क़त चलती रही मंज़िल को सर उस ने किया
परवीन शाकिर द्वारा
میں فقط چلتی رہی منزل کو سر اس نے کیا
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वह आश्ना-ए-मंज़िल-ए-उर्फ़ान हुआ नहीं
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
وہ آشنائے منزلِ عرفاں ہوا نہیں
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सवाद-ए-शहर-ए-मदीना के रूबरू होना
परवीन शाकिर द्वारा
سواد شہر مدینہ کے روبرو ہونا
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तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो
मिर्ज़ा ग़ालिब द्वारा
تم اپنے شکوے کی باتیں نہ کھود کھود کے پوچھو
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