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ग़म

सभी 204अशआर 0ग़ज़ल 204
ग़ज़ल204
दौलत-ए-दहर सब लुटाई है
دولت دہر سب لٹائی ہے
नाम ही क्या निशाँ ही क्या ख़्वाब-ओ-ख़याल हो गए
نام ہی کیا نشاں ہی کیا خواب و خیال ہو گئے
शौक़ का रंग बुझ गया याद के ज़ख़्म भर गए
شوق کا رنگ بجھ گیا یاد کے زخم بھر گئے
आप अपना ग़ुबार थे हम तो
آپ اپنا غبار تھے ہم تو
कैसा दिल और उस के क्या ग़म जी
کیسا دل اور اس کے کیا غم جی
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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