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दौलत-ए-दहर सब लुटाई है
دولت دہر سب لٹائی ہے
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नाम ही क्या निशाँ ही क्या ख़्वाब-ओ-ख़याल हो गए
نام ہی کیا نشاں ہی کیا خواب و خیال ہو گئے
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शौक़ का रंग बुझ गया याद के ज़ख़्म भर गए
شوق کا رنگ بجھ گیا یاد کے زخم بھر گئے
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आप अपना ग़ुबार थे हम तो
آپ اپنا غبار تھے ہم تو
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कैसा दिल और उस के क्या ग़म जी
کیسا دل اور اس کے کیا غم جی
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