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ग़म

सभी 204अशआर 0ग़ज़ल 204
ग़ज़ल204
ग़म-ए-दुनिया से गर पाई भी फ़ुर्सत सर उठाने की
غم دنیا سے گر پائی بھی فرصت سر اٹھانے کی
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
پھر مجھے دیدۂ تر یاد آیا
अब भला छोड़ के घर क्या करते
اب بھلا چھوڑ کے گھر کیا کرتے
कब से नज़र लगी थी दरवाज़-ए-हरम से
کب سے نظر لگی تھی دروازۂ حرم سے
जुज़ जुर्म-ए-इश्क़ कोई भी साबित किया गुनाह
جز جرم عشق کوئی بھی ثابت کیا گناہ
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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