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ग़म-ए-दुनिया से गर पाई भी फ़ुर्सत सर उठाने की
غم دنیا سے گر پائی بھی فرصت سر اٹھانے کی
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फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
پھر مجھے دیدۂ تر یاد آیا
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अब भला छोड़ के घर क्या करते
اب بھلا چھوڑ کے گھر کیا کرتے
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कब से नज़र लगी थी दरवाज़-ए-हरम से
کب سے نظر لگی تھی دروازۂ حرم سے
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जुज़ जुर्म-ए-इश्क़ कोई भी साबित किया गुनाह
جز جرم عشق کوئی بھی ثابت کیا گناہ
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