Be Sar O Saamaan The Lekin Itna Andaaza Na Tha
بے سر و ساماں تھے لیکن اتنا اندازہ نہ تھا
बे सर ओ सामाँ थे लेकिन इतना अंदाज़ा न था
ग़ज़ल
१ मिनट पढ़ने मेंبے سر و ساماں تھے لیکن اتنا اندازہ نہ تھا
اس سے پہلے شہر کے لٹنے کا آوازہ نہ تھا
Be sar o saamaan the lekin itna andaaza na tha
Is se pahle shahr ke lutne ka aavaaza na tha
बे सर ओ सामाँ थे लेकिन इतना अंदाज़ा न था
इस से पहले शहर के लुटने का आवाज़ा न था
ظرف دل دیکھا تو آنکھیں کرب سے پتھرا گئیں
خون رونے کی تمنا کا یہ خمیازہ نہ تھا
Zarf-e-dil dekha to aankhen karb se pathra gaee'n
Khoon rone ki tamanna ka ye khamyaaza na tha
ज़र्फ़-ए-दिल देखा तो आँखें कर्ब से पथरा गईं
ख़ून रोने की तमन्ना का ये ख़मियाज़ा न था
آ مرے پہلو میں آ اے رونق بزم خیال
لذت رخسار و لب کا اب تک اندازہ نہ تھا
Aa mre pahloo mein aa ae raunaq-e-bazm-e-khayaal
Lazzat-e-rukhsaar o lab ka ab tak andaaza na tha
आ म्रे पहलू में आ ऐ रौनक़-ए-बज़्म-ए-ख़याल
लज़्ज़त-ए-रुख़सार ओ लब का अब तक अंदाज़ा न था

अहमद फ़राज़ जदीद उर्दू ग़ज़ल के सबसे मक़बूल रूमानी शायर हैं, जिन्होंने अपनी शायरी में क्लासिकी रिवायत और जदीद खयालात को मिलाया, और तानाशाही के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की।
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