Yaad Ayyam Ke Yaan Tark-e-Shakeebai Tha

یاد ایام کہ یاں ترک شکیبائی تھا

याद अय्याम कि याँ तर्क-ए-शकेबाई था

ग़ज़ल

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یاد ایام کہ یاں ترک شکیبائی تھا
ہر گلی شہر کی یاں کوچۂ رسوائی تھا

Yaad ayyam ke yaan tark-e-shakeebai tha
Har gali sheher ki yaan koocha-e-ruswai tha

याद अय्याम कि याँ तर्क-ए-शकेबाई था
हर गली शहर की याँ कूचा-ए-रुसवाई था

اتنی گزری جو ترے ہجر میں سو اس کے سبب
صبر مرحوم عجب مونس تنہائی تھا

Itni guzri jo tere hijr mein so us ke sabab
Sabr marhoom ajab moonis-e-tanhai tha

इतनी गुज़री जो तिरे हिज्र में सो उस के सबब
सब्र मरहूम अजब मूनिस-ए-तन्हाई था

یہی زلفوں کی تری بات تھی یا کاکل کی
میرؔ کو خوب کیا سیر تو سودائی تھا

Yehi zulfon ki teri baat thi ya kaakul ki
Meer ko khoob kiya sair to saudai tha

यही ज़ुल्फ़ों की तिरी बात थी या काकुल की
मीर को ख़ूब किया सैर तो सौदाई था


मीर तक़ी मीर

शास्त्रीय

मीर ताक़ी 'मीर' उर्दू के महानतम क्लासिक शायर हैं, जिन्हें 'ख़ुदा-ए-सुख़न' (शायरी का ईश्वर) कहा जाता है। उन्होंने जीवन के दुखों को बेहद सरल भाषा में ढालकर उर्दू ग़ज़ल को अमर बना दिया।

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