Dil-o-Dimaagh Hai Ab Kis Ko Zindagani Ka
دل و دماغ ہے اب کس کو زندگانی کا
दिल-ओ-दिमाग़ है अब किस को ज़िंदगानी का
ग़ज़ल
१ मिनट पढ़ने मेंدل و دماغ ہے اب کس کو زندگانی کا
جو کوئی دم ہے تو افسوس ہے جوانی کا
Dil-o-dimaagh hai ab kis ko zindagani ka
Jo koi dam hai to afsos hai jawani ka
दिल-ओ-दिमाग़ है अब किस को ज़िंदगानी का
जो कोई दम है तो अफ़सोस है जवानी का
اگرچہ عمر کے دس دن یہ لب رہے خاموش
سخن رہے گا سدا میری کم زبانی کا
Agarchay umr ke das din yeh lab rahe khaamosh
Sukhan rahega sada meri kam-zabaani ka
अगरचे उम्र के दस दिन यह लब रहे ख़ामोश
सुख़न रहेगा सदा मेरी कम-ज़बानी का
سبک ہے آوے جو مندیل رکھ نماز کو شیخ
رہا ہے کون سا اب وقت سرگرانی کا
Sabuk hai aawe jo mandeel rakh namaaz ko shaikh
Raha hai kaun sa ab waqt sargiraani ka
सबुक है आवे जो मंदील रख नमाज़ को शैख़
रहा है कौन सा अब वक़्त सरगिरानी का
ہزار جان سے قربان بے پری کے ہیں
خیال بھی کبھو گزرا نہ پرفشانی کا
Hazaar jaan se qurbaan be-pari ke hain
Khayaal bhi kabhu guzra na parfishaani ka
हज़ार जान से क़ुर्बान बे-परी के हैं
ख़याल भी कभूँ गुज़रा न परफ़िशानी का

शास्त्रीय
मीर ताक़ी 'मीर' उर्दू के महानतम क्लासिक शायर हैं, जिन्हें 'ख़ुदा-ए-सुख़न' (शायरी का ईश्वर) कहा जाता है। उन्होंने जीवन के दुखों को बेहद सरल भाषा में ढालकर उर्दू ग़ज़ल को अमर बना दिया।
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