Yun Bahaar Aayi Hai Is Baar Ke Jaise Qasid
یوں بہار آئی ہے اس بار کہ جیسے قاصد
यूं बहार आई है इस बार कि जैसे क़ासिद
ग़ज़ल
१ मिनट पढ़ने मेंیوں بہار آئی ہے اس بار کہ جیسے قاصد
کوچۂ یار سے بے نیل مرام آتا ہے
Yun bahaar aayi hai is baar ke jaise qasid
Kooche-e-yaar se be-neel-e-maraam aata hai
यूं बहार आई है इस बार कि जैसे क़ासिद
कूचा-ए-यार से बे-नील-ए-मराम आता है
ہر کوئی شہر میں پھرتا ہے سلامت دامن
رند مے خانے سے شائستہ خرام آتا ہے
Har koi shehar mein phirta hai salaamat daaman
Rind mai-khaane se shaayista kharaam aata hai
हर कोई शहर में फिरता है सलामत दामन
रिंद मय-ख़ाने से शाइस्ता ख़िराम आता है
ہوس مطرب و ساقی میں پریشاں اکثر
ابر آتا ہے کبھی ماہ تمام آتا ہے
Hawas mutrib-o-saaqi mein pareshaan aksar
Abr aata hai kabhi maah-e-tamaam aata hai
हवस मुतरिब-ओ-साक़ी में परेशां अक्सर
अब्र आता है कभी माह-ए-तमाम आता है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ उर्दू के वो अहद-साज़ शायर हैं जिन्होंने इश्क़ की नफ़ासत को इन्क़िलाबी सोच से जोड़कर दुनिया भर में शौहरत हासिल की और अपने विचारों के लिए जेल भी गए।
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