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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे
کتنے عیش سے رہتے ہوں گے کتنے اتراتے ہوں گے
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दर्द-ओ-अंदोह में ठहरा जो रहा मैं ही हूँ
درد و اندوہ میں ٹھہرا جو رہا میں ہی ہوں
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ले उड़ा फिर कोई ख़याल हमें
لے اڑا پھر کوئی خیال ہمیں
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वो दुश्मन-ए-जाँ जाँ से प्यारा भी कभी था
وہ دشمن جاں جان سے پیارا بھی کبھی تھا
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जो भी दरून-ए-दिल है वो बाहर न आएगा
جو بھی درون دل ہے وہ باہر نہ آئے گا
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