Bakht Se Koi Shikayat Hai Na Aflaak Se Hai
بخت سے کوئی شکایت ہے نہ افلاک سے ہے
बख़्त से कोई शिकायत है न अफ़लाक से है
ग़ज़ल
१ मिनट पढ़ने मेंبخت سے کوئی شکایت ہے نہ افلاک سے ہے
یہی کیا کم ہے کہ نسبت مجھے اس خاک سے ہے
Bakht se koi shikayat hai na aflaak se hai
Yahi kya kam hai ke nisbat mujhe is khaak se hai
बख़्त से कोई शिकायत है न अफ़लाक से है
यही क्या कम है कि निस्बत मुझे इस ख़ाक से है
خواب میں بھی تجھے بھولوں تو روا رکھ مجھ سے
وہ رویہ جو ہوا کا خس و خاشاک سے ہے
Khwaab mein bhi tujhe bhoolun to rawa rakh mujh se
Woh rawaiya jo hawa ka khas-o-khaashaak se hai
ख़्वाब में भी तुझे भूलूँ तो रवा रख मुझ से
वो रवैया जो हवा का ख़स-ओ-ख़ाशाक से है
بزم انجم میں قبا خاک کی پہنی میں نے
اور مری ساری فضیلت اسی پوشاک سے ہے
Bazm-e-anjum mein qaba khaak ki pehni maine
Aur meri saari fazeelat isi poshaak se hai
बज़्म-ए-अंजुम में क़बा ख़ाक की पहनी मैंने
और मिरी सारी फ़ज़ीलत इसी पोशाक से है

परवीन शाकिर उर्दू की वो अनूठी और मक़बूल शायरा थीं, जिन्होंने औरतों के जज़्बातों, इश्क़ की गहराई और सामाजिक जुल्म के ख़िलाफ़ बेबाक आवाज़ उठाकर स्त्री शायरी को एक नया आयाम दिया।
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