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झुमके दिखा के तूर को जिन ने जला दिया
मीर तक़ी मीर द्वारा
جھمکے دکھا کے طور کو جن نے جلا دیا
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मक़ाम-ए-होश से गुज़रा मकाँ से ला-मकाँ पहुँचा
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
مقام ہوش سے گزرا مکاں سے لا مکاں پہنچا
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उन के जलवों पे हम-वक्त नज़र होती है
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
ان کے جلووں پہ ہمہ وقت نظر ہوتی ہے
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रंग पैराहन का ख़ुशबू ज़ुल्फ़ लहराने का नाम
فیض احمد فیض द्वारा
رنگ پیراہن کا خوشبو زلف لہرانے کا نام
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गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
فیض احمد فیض द्वारा
گلوں میں رنگ بھرے باد نوبہار چلے
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किस हर्फ़ पे तू ने गोश-ए-लब ऐ जान-ए-जहाँ ग़म्माज़ किया
فیض احمد فیض द्वारा
کس حرف پہ تو نے گوشۂ لب اے جان جہاں غماز کیا
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उस का अपना ही करिश्मा है फ़सूँ है यूँ है
अहमद फ़राज़ द्वारा
اس کا اپنا ہی کرشمہ ہے فسوں ہے یوں ہے
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आगे हमारे अहद से वहशत को जा न थी
मीर तक़ी मीर द्वारा
آگے ہمارے عہد سے وحشت کو جا نہ تھی
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करते ही नहीं तर्क-ए-बुताँ तौर-ए-जफ़ा का
मीर तक़ी मीर द्वारा
کرتے ہی نہیں ترک بتاں طور جفا کا
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बाहोश वही हैं दीवाने उल्फ़त में जो ऐसा करते हैं
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
باہوش وہی ہیں دیوانے الفت میں جو ایسا کرتے ہیں
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उस का ख़याल चश्म से शब ख़्वाब ले गया
मीर तक़ी मीर द्वारा
اس کا خیال چشم سے شب خواب لے گیا
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हरीम-ए-शाह में देखी न ख़ानक़ाह में है
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
حریم شاہ میں دیکھی نہ خانقاہ میں ہے
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जल्वा जो तेरे रुख़ का एहसास में ढल जाए
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
جلوہ جو ترے رخ کا احساس میں ڈھل جائے
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निकले वो फूल बन के तेरे गुलिस्तां से हम
फ़ना बुलंदशहरी द्वारा
نکلے وہ پھول بن کے ترے گلستاں سے ہم
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आओ कभू तो पास हमारे भी नाज़ से
मीर तक़ी मीर द्वारा
آؤ کبھو تو پاس ہمارے بھی ناز سے
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शाख़ पर ख़ून-ए-गुल रवाँ है वही
فیض احمد فیض द्वारा
شاخ پر خون گل رواں ہے وہی
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यह मौसम-ए-गुल गरचह तरब-ख़ेज़ बहुत है
فیض احمد فیض द्वारा
یہ موسم گل گرچہ طرب خیز بہت ہے
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सुबह की आज जो रंगत है वह पहले तो न थी
فیض احمد فیض द्वारा
صبح کی آج جو رنگت ہے وہ پہلے تو نہ تھی
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कभी कभी याद में उभरते हैं नक़्श-ए-माज़ी मिटे मिटे से
فیض احمد فیض द्वारा
کبھی کبھی یاد میں ابھرتے ہیں نقشِ ماضی مٹے مٹے سے
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जान से इश्क़ और जहाँ से गुरेज़
अहमद फ़राज़ द्वारा
جان سے عشق اور جہاں سے گریز
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