Nahi Nigah Mein Manzil Toh Justuju Hi Sahi
نہیں نگاہ میں منزل تو جستجو ہی سہی
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
ग़ज़ल
१ मिनट पढ़ने मेंنہیں نگاہ میں منزل تو جستجو ہی سہی
نہیں وصال میسر تو آرزو ہی سہی
Nahi nigah mein manzil toh justuju hi sahi
Nahi wisaal mayassar toh aarzoo hi sahi
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही
نہ تن میں خون فراہم نہ اشک آنکھوں میں
نماز شوق تو واجب ہے بے وضو ہی سہی
Na tan mein khoon faraham na ashk aankhon mein
Namaz-e-shauq toh wajib hai be-wuzu hi sahi
ना तन में ख़ून फ़राहम ना अश्क आँखों में
नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वुज़ू ही सही
کسی طرح تو جمے بزم مے کدے والو
نہیں جو بادہ و ساغر تو ہاؤ ہو ہی سہی
Kisi tarah toh jame bazm-e-maikade walo
Nahi jo baada-o-saaghar toh haao-hoo hi sahi
किसी तरह तो जमे बज़्म-ए-मय-कदे वालो
नहीं जो बाद-ओ-सागर तो हाओ-हू ही सही

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ उर्दू के वो अहद-साज़ शायर हैं जिन्होंने इश्क़ की नफ़ासत को इन्क़िलाबी सोच से जोड़कर दुनिया भर में शौहरत हासिल की और अपने विचारों के लिए जेल भी गए।
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